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    Avatar Ranjan Agrawal             April 14, 2020 

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JANTA DAL UNITED

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OVERVIEW

जनता दल (यूनाइटेड) (जदयू) भारत का एक प्रमुख राजनैतिक दल है। इसे राज्य स्तरीय राजनीतिक पार्टी का दर्जा प्राप्त है। इस राजनीतिक दल की उपस्थिति मुख्य रूप से बिहार में है।.[2] जनता दल (यूनाइटेड) का गठन 30 अक्टूबर 2003 को जनता दल के शरद यादव गुट, लोकशक्ति पार्टी और समता पार्टी के विलय के बाद किया गया। जद(यू) अब भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में गठित राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का घटक दल है।1999 के आम चुनाव में कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री जे.एच पटेल के नेतृत्व में जनता दल के एक गुट ने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन दे दिया। इसके बाद जनता दल दो हिस्सों में बंट गया। पहले धड़े ने एच.डी.देवेगौड़ा के नेतृत्व में जनता दल (सेक्यूलर) के रूप में खिद को अलग कर लिया जबकि दूसरा धड़ा शरद यादव के नेतृत्व में अस्तित्व में आया। बाद में जनता दल का शरद यादव गुट, लोकशक्ति पार्टी और समता पार्टी पास आए और 30 अक्टूबर 2003 को आपस में विलय कर जनता दल (यूनाइटेड) नाम से एक नई पार्टी का गठन किया। इस दल का चुनाव-चिह्न तीर और झंडा हरे-सफेद रंग का पंजीकृत हुआ।

IDEOLOGY

मनुष्य एक विचारशील प्राणी है। वह सोचता-विचारता और चिन्तन करता है। विचारधारा के मूल में विचार ही प्रमुख है। लेकिन किसी विचार को विचारधारा बनने की दो शर्तें हैं – पहली शर्त कि वह विचार लम्बे समय तक धारा की तरह प्रवाहित होता रहे और दूसरी शर्त कि उसे सामाजिक स्वीकृति प्राप्त हो जाय। इस प्रकार कोई सदविचार समय के अन्तराल के साथ केन्द्रित होकर समाज की स्वीकृति प्राप्त कर लेता है और तभी वह विचारधारा के रूप में मान्य होता है। सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक या धार्मिक सभी क्षेत्रों में विचारधारा का निर्माण इसी प्रक्रिया के अनुरूप होता है। इसमें व्यक्ति (विचारक) के विचार की निरन्तरता और उसका प्रभाव तथा सामाजिक मान्यता तीनों चीजें महत्वपूर्ण होती हैं।

एक राजनीतिक पार्टी के रूप में जनता दल (यू) की विचारधारा महात्मा गांधी, राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण और बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर की विचारधारा है। भारत के संविधान में हमारी आस्था और समाजवाद, धर्म निरपेक्षता एवं लोकतंत्र के सिद्धान्तों में विश्वास है। गांधीवादी सिद्धान्तों तथा स्वतंत्रता आन्दोलन के मूल्यों, आदर्शों एवं परम्पराओं से प्रेरणा लेकर देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता को सुरक्षित रखने के लिए हम कृतसंकल्प हैं।

राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए विचारधारा की जानकारी इसलिए भी जरूरी है कि वे अपनी राजनीतिक परम्परा से परिचित हो सकें और अपने पुरखों की वैचारिक विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लें तथा उसके अनुरूप काम कर सकें। इस दृष्टि से महात्मा गांधी का जीवन राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणास्त्रोत है। अपना सार्वजनिक जीवन उन्होंने दक्षिण अफ्रीका से शुरू किया था। वहीं उन्होंने सत्याग्रह का प्रयोग किया। सत्याग्रह आन्दोलन के दौरान ही लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौटते हुए उन्होंने ‘हिन्द स्वराज’ नामक पुस्तिका लिखी जो गांधी-दर्शन को जानने समझने का सूत्र है। दरअसल उन्होंने भारत की विभिन्न समस्याओं पर टिप्पणियों के रूप में अपने विचारों को सूत्रबद्ध किया। इसकी रचना 1909 ई. में हुई। वस्तुतः ‘हिन्द स्वराज’ गांधी की विचारयात्रा की बुनियाद है।

डॉ. राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण गांधी जी के व्यक्तित्व और विचारों से प्रभावित थे। केवल ये ही नहीं, बल्कि समाजवादी धारा के प्रायः सभी नेता – आचार्य नरेन्द्र देव, अच्युत पटवर्द्धन, अशोक मेहता, आचार्य जेबी कृपलानी, यूसुफ मेहर अली, अरूणा आसफ अली, गांधीजी के नेतृत्व में भारत की आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। यह एक विदित तथ्य है कि पटना में 17 मई 1934 ई. को अंजुमन इस्लामिया हॉल में देश भर के समाजवादियों का सम्मेलन हुआ; जिसकी अध्यक्षता आचार्य नरेन्द्र देव ने की। यहीं कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (सीएसपी) का गठन हुआ। गांधीजी के नेतृत्व में सभी समाजवादियों ने आजादी के आन्दोलन में हिस्सा लिया और अपनी प्रभावकारी भूमिका निभाई।

सन् 1915 ई. में गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से लौटे और गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर एक साल तक देश का दौरा किया। जनता की समस्याओं से रूबरू होने का यह बड़ा अवसर था। गांधीजी के कांग्रेस में सक्रिय होने से पहले कांग्रेस पार्टी प्रस्ताव पेश कर कुछ सुविधाएं हासिल करने वाली बड़े वकीलों और जमींदारों की पार्टी समझी जाती थी। गांधीजी ने इसे आम जनता से जोड़ दिया। इसकी शुरूआत उन्होंने 1917 ई. में चम्पारण से की। पं. राजकुमार शुक्ल के अथक प्रयास से चम्पारण के किसानों को नीलहे अंग्रेजों के अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए गांधीजी चम्पारण आए। यहां यह भी जानना जरूरी है कि राजकुमार शुक्ल के निकट सहयोगी थे – पीर मोहम्मद मुनीस। वे पत्रकार थे। गांधीजी के नाम राजकुमार शुक्ल की सारी चिठ्ठियां वे ही लिखते थे। अतः पीर मोहम्मद मुनीस की भूमिका नेपथ्य की रही; जिन्होंने पत्रों में चम्पारण के किसानों की दयनीय दशा का मार्मिक चित्र प्रस्तुत कर गांधीजी को आने के लिए विवश किया।

आज चम्पारण सत्याग्रह के सौ साल पूरा होने पर मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने एक साल तक विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजन के द्वारा शताब्दी-वर्ष मनाने की शुरूआत की है। इसमें महात्मा गांधी के विचारों को जन-जन तक पहंचाने का कार्यक्रम भी शामिल है। वस्तुतः आजादी के आन्दोलन के दौरान समाजवादी नेताओं की गांधीजी में भरपूर आस्था थी। सन् 1942 की अगस्त क्रांति इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। 8 अगस्त 1942 को बम्बई में कांग्रेस का महाधिवेशन आयोजित था, जिसमें गांधीजी ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा दिया था। उस अधिवेशन का प्रस्ताव गांधीजी ने आचार्य नरेन्द्र देव से लिखवाया था जो सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापकों में प्रमुख थे। उस समय प्रख्यात समाजवादी बौद्धिक यूसुफ मेहर अली बम्बई के मेयर थे। उनके सहयोग से अधिवेशन के लिए बम्बई महानगर को आकर्षक ढंग से सजाया गया था। गांधीजी इन युवा समाजवादियों से स्नेह करते थे। डॉ. लोहिया ने अपनी पुस्तक ‘भारत विभाजन के अपराधी’ में लिखा है कि ‘‘अपने अंतिम दिनों में गांधीजी मुझे बहुत मानने लगे थे, जैसे घर का कोई बूढ़ा आदमी बेटे से नाराज होकर पोते को प्यार करने लगता है; गांधीजी कुछ उसी तरह मुझे मानने लगे थे।’’

इसलिए 42 के आन्दोलन में जब गांधीजी सहित कांग्रेस के सभी बड़े नेता गिरफ्तार हो गये तो समाजवादियों ने मोर्चा संभाला और आन्दोलन को गांव-गांव तक फैलाने के लिए कठिन संघर्ष किया और जेल-यातनाएं सहीं। डॉ. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्द्धन, अरूणा आसफ अली, अशोक मेहता, जेबी कृपलानी जैसे अनेक समाजवादी नेताओं की उल्लेखनीय भूमिका रही। देश के आजाद होने के बाद भी समाजवादी नेताओं ने लोकतंत्र की रक्षा और देश के नव-निर्माण के लिए संघर्ष किया। छठे दशक में डॉ. लोहिया ने राजनीतिक चेतना फैलाने का अथक प्रयास किया। उनका गैर-कांग्रेसवाद का नारा सन् 1967 के आम चुनाव में फलीभूत हुआ जब देश के 8 राज्यों में कांग्रेस की पराजय हुई और गैर-कांग्रेसी संविद सरकारों का गठन हुआ। डॉ. लोहिया स्वयं 1967 के लोकसभा चुनाव में कन्नौज से निर्वाचित हुए। डॉ. लोहिया का यह राजनीतिक प्रयोग पुनः एक दशक बाद 1977 में जेपी द्वारा दोहराया गया। इस बार केन्द्र की सत्ता से कांग्रेस विस्थापित हुई। जेपी ने बिहार में 74 के आन्दोलन का नेतृत्व किया। इमरजेंसी लगी और बाद में जब लोकसभा का चुनाव हुआ तो कांग्रेस पराजित हो गयी। इमरजेंसी के खिलाफ लड़ने वाले लोग केन्द्र की सत्ता में आये और फिर राज्यों में भी विधानसभा के चुनाव के बाद इनकी सरकारें बनीं।

राजनीतिक परिवर्तन की इसी धारा से जनता दल (यू) का निर्माण हुआ है, जिसका नेतृत्व आज श्री नीतीश कुमार जी कर रहे हैं। हमें इस बात का गर्व है कि भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन के महापुरूषों के विचारों, आदर्शों और मूल्यों की जो राजनीतिक विरासत है, उसी की बुनियाद पर जद (यू) का गठन हुआ है। महात्मा गांधी ने हमें आजादी दी, डॉ. लोहिया और जेपी ने उस आजादी की रक्षा करने और उसकी उपलब्धियों को लोगों तक पहुंचाने के लिए संघर्ष का रास्ता दिखाया तथा डॉ. अंबेडकर ने उस लोकतंत्र को बचाने के लिए संविधान का रक्षा-कवच दिया। हमारा संसदीय लोकतंत्र उस संविधान के आधार पर चल रहा है। इन्हीं समाजवादी विचारों और लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर जननायक कर्पूरी ठाकुर आये और सत्ता का उपयोग उन्होंने जन-सेवा के लिए किया। राजनीति के उसी रास्ते पर श्री नीतीश कुमार चल रहे हैं। न्याय के साथ विकास का यह रास्ता बिहार के चौतरफा विकास का द्वार खोल चुका है और मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार का प्रयास है कि इसका लाभ समाज के अंतिम आदमी तक पहुंचे। जनता दल (यूनाइटेड) की राजनीति का यही लक्ष्य है जो लोकतांत्रिक और समाजवादी विचारधारा की बुनियाद पर खड़ा है।

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